परम पूज्य समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के 59वें मुनिदीक्षा स्मृति महोत्सव
18 जुलाई 2026
विशेष प्रस्तुति
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प्रेरणा स्रोत:-
मुनि श्री भावसागर जी महाराज
“तप की वह अखंड ज्योति” 🍀🏵️
शब्दों की सीमा बहुत छोटी है और जिनगुण अनंत हैं। भला कौन सी कलम है जो वीतराग की महिमा को पूर्णतः लिख सके?
मैं अपनी अल्प बुद्धि लेकर सागर की थाह और आकाश की ऊँचाई नापने चला हूँ। परन्तु परम पूज्य गुरुवर मुनि श्री भावसागर जी महाराज के आशीर्वाद और प्रेरणा से यह भाव पुष्प अर्पित करने का साहस जुटा पाया हूँ।
मैंने ईश्वर को अब तक केवल मंदिरों की वेदी पर देखा था।
किन्तु जब मैंने परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के दर्शन किए, तब हृदय से यही ध्वनि निकली – “हाँ, मैंने भगवान को देखा है।”
यह केवल भावावेश नहीं, यह मेरी अंतरात्मा की अनुभूति है।
वह तप और त्याग की वह ज्योति थे जो युगों-युगों तक आलोकित रहेगी।
उनकी निर्मल चर्या आज भी हमें चौथे काल की झलक दिखाती है।
युगों-युगों में कभी कोई ऐसी विभूति अवतरित होती है जो उपदेश नहीं देती, स्वयं उपदेश बन जाती है।
उनका संपूर्ण जीवन ही धर्म का साकार स्वरूप था। अपने आचरण से उन्होंने असंख्य जिज्ञासुओं, श्रावक-श्राविकाओं को मोक्षमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
आज न जाने कितने साधकों ने उनसे दीक्षा लेकर अपना कल्याण किया और समाज व राष्ट्र के कल्याण में जुटे हैं।
यह किसी एक व्यक्ति का प्रभाव नहीं, यह एक युगपुरुष की तपश्चर्या का प्रत्यक्ष परिणाम है।
वह ऐसे महातपस्वी थे जिनका प्रत्येक श्वास संयम था, प्रत्येक कदम वैराग्य था, और प्रत्येक क्षण आत्मसाधना की आराधना था।
उन्होंने जगत को सिखाया कि आत्मा का प्रकाश बाहर नहीं, भीतर प्रज्वलित होता है।
जब राग शांत होता है, द्वेष क्षीण होता है, कषाय गलती हैं और अहंकार विलीन होता है – तभी आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। यही उनका मौन, किन्तु अमर संदेश है।
आचार्य श्री ने सिद्ध किया –
तप = शरीर को कष्ट नहीं, इच्छाओं का विसर्जन
त्याग = वस्तुओं का नहीं, अहंकार का त्याग
साधना = पूजा की क्रिया नहीं, आत्मा की जागृति
शरीर से भले ही वे आज दृष्टि से ओझल हों, पर उनका तप, तेज, वाणी, आदर्श और दिखाया हुआ मार्ग युग-युग तक साधकों का पथ आलोकित करता रहेगा।
समय बदलेगा, पीढ़ियाँ बदलेंगी, पर जब भी संयम, तप, त्याग और आत्मसाधना का इतिहास लिखा जाएगा, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा।
परम पूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज को शत-शत वंदन जिन्होंने उन्हें दीक्षा दी।
वर्तमान में परम पूज्य आचार्य श्री समयसागर जी महाराज उसी आचार्य पद को सुशोभित कर, सरलता और वीतरागता का प्रकाश फैला रहे हैं।
ऐसे वीतराग पथ के महान साधक, राष्ट्रसंत आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के श्रीचरणों में कोटि-कोटि नमन 🙏
– अरुण कुमार जैन
वाराणसी
(गोयल कुमार)
