समाधि मरण को मृत्यु महोत्सव कहा गया है

झुमरी तिलैया न्यूज़ 16/05/2026

समाधि मरण को मृत्यु महोत्सव कहा गया है

महाकविआचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का समाधि स्मृति महोत्सव मनाया गया

समाधिस्थ परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज एवं मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सान्निध्य में एवं पंडित अभिषेक शास्त्री झुमरी तिलैया कें निर्देशन में 16 मई 2026 को प्रातःकाल श्री दिगंबर जैन बड़ा मंदिर, झुमरी तिलैया, कोडरमा (झारखंड) में परम पूज्य महाकविआचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज का समाधि स्मृति महोत्सव श्रद्धा एवं भक्ति के साथ मनाया गया।
परम पूज्य समाधिस्थ महाकविआचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज एवं
समाधिस्थ परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
के चरण चिह्न का प्रथम बार 36 विशिष्ट मंत्र से अभिषेक करने का सौभाग्य संजय गंगवाल पूजा भंडार को प्राप्त हुआ,
कार्यक्रम का शुभारंभ चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र अर्पण के साथ हुआ। तत्पश्चात आचार्य श्री की पूजन संपन्न हुई।
इस अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज ने कहा कि गुरु मुख से हम उनका गुणगान सुनते आए हैं। सभी धर्म जीने की कला सिखाते हैं, परंतु जैन धर्म मरने की कला भी सिखाता है। दुनिया मृत्यु से भयभीत रहती है, किंतु समाधि रूपी मृत्यु को श्रेष्ठ माना गया है।
मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में कहा कि समाधि मरण एवं सल्लेखना को शास्त्रों में मृत्यु महोत्सव तथा वीरमरण कहा गया है। जन्म का महोत्सव तो संपूर्ण जगत मनाता है, किंतु मृत्यु का महोत्सव बिरले ही लोग मना पाते हैं। आयु के क्षय को मरण कहा गया है। मृत्यु शरीरधारियों की प्रकृति है, परंतु जो साधक समाधि मरण करता है वह भव्य आत्मा अल्प भवों में मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होती है।
उन्होंने कहा कि कषाय एवं शरीर को कृश करना सल्लेखना कहलाता है। जब शरीर रोगग्रस्त हो जाता है अथवा जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं जहाँ जीने का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता, तब साधक शरीर से ममत्व त्यागकर सल्लेखना धारण करता है। जैसे कोई व्यक्ति शरीर का दान करता है, उसी प्रकार आत्मकल्याण हेतु शरीर के माध्यम से सल्लेखना की साधना की जाती है।
शरीर तो एक दिन छूटना ही है, किंतु आत्मा की सुरक्षा एवं कल्याण के लिए सल्लेखना ग्रहण की जाती है। दीक्षा भी सल्लेखना की साधना हेतु ली जाती है, जिसमें क्रमशः अन्न-जल का त्याग एवं निर्जल उपवास की साधना की जाती है।
संपूर्ण जानकारी हेतु देखें
https://linktr.ee/Jindharmmatter
वेबसाईट:- www.jindharma.com

कार्यक्रम की वीडियो देखें
यू ट्यूब :- jaindharmvani
🌹🌿🏵️🌿🌷☘️ 🏵️🌱
प्रेषक समूह
रानू जैन नोहटा7879068125
संतोष (मंदिर व्यवस्थापक) 7631157819
दीपक व्यवस्थापक
7294853537

Related Posts