न्यूज़ वाराणसी 30/09/2026
क्षुल्लक श्री गणेश प्रसाद वणीं जी का 153 वां जन्म जयंती महोत्सव मनाया गया
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समाधिस्थ परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज, मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सान्निध्य में 30 सितंबर 2026 को प्रातः काल की बेला में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन तीर्थ भेलूपुर वाराणसी उत्तर प्रदेश में मांगलिक क्रियाएं की गई समाधिस्थ क्षुल्लक श्री गणेश प्रसाद वणीं जी का 153 वां जन्म जयंती महोत्सव मनाया गया, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन किया गया, इस अवसर पर धर्मसभा का आयोजन किया गया।
धर्म सभा को संबोधित करते हुए
मुनि श्री भाव सागर जी महाराज ने कहा कि वर्णी जी जैन नहीं थे लेकिन श्री पद्मपुराण जी ग्रंथ के वाक्य सुनकर के रात्रि भोजन का त्याग किया था और णमोकार मंत्र पर सच्ची श्रद्धा रख करके वह जैन बन गए थे, उन्होंने नियम लिया था जैन धर्म ही मेरा कल्याण करेगा, 12 जून 1905 को उन्होंने वाराणसी में स्याद्वाद महाविद्यालय की स्थापना की थी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी इस विद्यालय से प्रभावित हुए थे, पंडित भूरामल शास्त्री समाधिस्थ महाकवि आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज जो समाधिस्थ परम पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के गुरु थे उन्होंने इस विद्यालय में अध्ययन भी किया था, उसके बाद संस्कृत में टीका भी लिखी, गंगा नदी का किनारा बुद्धि प्रदाता है, मुनि श्री पूज्य सागर जी महाराज एवं मुनि श्री विमल सागर जी महाराज ने भी इस विद्यालय में अध्ययन किया, रोने से किसी कार्य की सिद्धि नहीं होती करने से मोक्ष लाभ हो जाता है, छात्रों की पूरे देश में भोजन की अच्छी व्यवस्था होना चाहिए नो लोस नो प्रॉफिट पर, सोले के भोजन की व्यवस्था भी ऑनलाइन ऑर्डर पर आने जाने वाले तीर्थ यात्री के लिए होना चाहिए।
मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज ने कहा कि कुछ व्यक्तित्व असाधारण होते हैं, उन्होंने जो देश को दिया है वह अवर्णनीय है, उन्होंने स्याद्वाद महाविद्यालय का निर्माण करवाया था, उन्होंने विद्वानों को बनाने में योगदान दिया था, उन्होंने दूर दृष्टि का उपयोग किया, पूरे भारत में विद्यालय खुलवाने के लिए अलख जगायी, आगामी पीढ़ी को परेशानी नहीं हो उसके लिए प्रयास किया, स्वयं अंधेरे में रहकर दूसरों को प्रकाश दिया।
ब्रह्मचारी पुष्पेंद्र भैया जी ने कहा कि हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व होता है जब विद्वान विलुप्त हो रहे थे तब स्याद्वाद महाविद्यालय की स्थापना की, जो साधु छात्र दिखाई दे रहे हैं यह उनकी देन है, प्रो डॉ अशोक कुमार जैन ने कहा कि आज जिनवाणी के प्रति झुकाव नहीं है, उन्होंने अपना तन-मन-धन लगा दिया था, श्रीमती प्रमिला सांवरिया ने कहा कि मैं वर्णी जी के अच्छे कार्यों की अनुमोदना करती हूं, ब्रह्मचारी प्रदीप पीयूष ने कहा उनके कार्यों को कोई भुला नहीं सकता, डॉ मंदिर विरल कुमार भगत भाई ने संस्कृत में उद्बोधन दिया और कहा कि वर्णी जी ने बहुत अच्छे कार्य किए थे। विजय कुमार जैन ने कहा कि कम से कम 100 विद्यार्थी प्रत्येक वर्ष रहना चाहिए, ब्रह्मचारी आकाश भैया जी ने कहा कि विद्यालय के लिए आप सभी को विशेष सहयोग देना है। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित प्रो डॉ फूलचंद प्रेमी ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने शिक्षा नीति को आगे बढ़ाया है, उनकी शिक्षा नीति लागू होना चाहिए। ब्रह्मचारी हरीश भैया जी ने कहा कि वर्णी जी के 350 मूल पत्र हमारे पास मौजूद हैं

