अष्टानिका पर्व का महत्व एकम आठ दिन के जाप
अष्ठानिका पर्व वर्ष में 3 बार आते हैं।
(1) आषाढ़ सुदी अष्टमी से पूर्णमासी तक
(2) फाल्गुन सुदी अष्टमी से पूर्णमासी तक
(3) कार्तिक सुदी अष्टमी से पूर्णमासी तक
*अठाई रासा*जम्बूद्वीप सुहावणो, लख योजन विस्तार।
भरत क्षेत्र दक्षिण दिशा, पोदनपुर तहँ सार।।
प्राणी वरत अठाई जे करें, ते पावें भव पार।।1।।
भावार्थ-: जम्बू नाम का द्वीप सुन्दर है,एक लाख योजन विस्तार वाला हैं।भरतक्षेत्र के दक्षिण दिशा में पोदनपुर नाम का नगर था।
जो प्राणी अष्ठानिका पर्व में व्रतादि करते हैं वे प्राणी भवसागर से पार हो जाते हैं।
विद्यापति विद्याधरी, सोमा राणी राय।
समकित पाले मन वचे, धर्म सुने अधिकाय।।2।।
भावार्थ-: एक विद्याधर और उनकी रानी सोमा थी। जो मन-वचन से सम्यग्दर्शन का पालन करती थी और धर्म सुनने की अधिकारी थी।
चारणमुनि तहाँ पारणे, आये राजा गेह।
सोमाराणी आहार दे, पुण्य बढ़ो अति गेह।।3।।
भावार्थ-: चारण ऋद्धिधारी मुनिराज पारणे के लिए विद्याधर राजा के यहाँ आये।सोमारानी ने आहार देकर बहुत बड़ा पूण्य कमाया।
ताहि समय नभ-देवता, चाले जात विमान। जय-जय शब्द भयो घनो, मुनिवर पूछ्यो ज्ञान।।4।।
भावार्थ-: उसी समय आकाश मार्ग से देवता विमान से चले जा रहे थे। जयकारो के शब्दों से आकाश गुंजायमान हो रहा था।रानी ने मुनिवर से पूछा-मुनिवर ये देवतागण कहाँ जा रहे है?
मुनिवर बोले रानि सुन, नंदीश्वर की जात्र।
जे नर करहिं स्वभावसों, ते पावे शिवकांत।।5।।
भावार्थ-: मुनिवर रानी से बोले-ये देवता नन्दीश्वरद्वीप की ओर जा रहे हैं।नन्दीश्वरद्वीप जाकर जो प्राणी(देवता) जिनचैत्यालयों की भावों से पूजन करता है वो प्राणी मोक्षमहल को प्राप्त करता हैं।
ऐसो वच राणी सुन्यो,मन में भयो आनन्द।
नन्दीश्वर-पूजा करें, ध्यावें आदि जिनन्द।।6।।
भावार्थ-: मुनिराज के ऐसे वचन सुनकर रानी को मन में बहुत आनन्द हुआ। आदिनाथ जिनेन्द्र का ध्यान करते हुए नन्दीश्वर द्वीप की पूजन की।
कार्तिक फागुन साढ़ में, पालें मन-वच-काय।
आठ-दिवस पूजा करें, तीन भवान्तर थाय।।7।।
भावार्थ-: कार्तिक,फाल्गुन और आषाढ़ में मन-वचन-काय से जो नियमों का पालन करता हुआ जो आठ दिनों तक पूजन करता हैं, वो 3 भव के पश्चात मोक्ष सुख को प्राप्त करता हैं।
विद्यापति सुन चालियो,रच्यो विमान अनूप।
रानी बरजै राय को,तुम हो मानुष-भूप।।8।।
भावार्थ-: मुनिराज के वचन जब विद्याधर ने सुने,तब उसके भाव नन्दीश्वर द्वीप जाने के हुए।और जिसकी उपमा नहीं दी जा सकती ऐसे सुन्दर विमान की रचना की।रानी ने विद्याधर को समझाया कि आप नन्दीश्वर द्वीप नहीं जा सकते क्योंकि आप मनुष्य हो।
मानुषोत्तर लंघे नहीं, मानुष जेती जात।
जिनवाणी निश्चय कही,तीन-भुवन विख्यात।।9।।
भावार्थ-: रानी ने कहा-मनुष्य ढाई द्वीप अर्थात् मानुषोत्तर पर्वत से आगे नहीं जा सकते हो।ऐसा जिनेन्द्रदेव की वाणी में आया हैं, जो जिनवाणी तीनों लोकों में प्रसिद्ध हैं।
पर विद्यापति ना सुनि, चल्यो नन्दीश्वर-द्वीप।
मानुषोत्र-गिरसों मिलो,जाय विमान महीप।।10।।
भावार्थ-: विद्याधर ने रानी की बात नहीं सुनी अर्थात् विश्वास नहीं किया और नन्दीश्वर द्वीप के लिए चल दिया।विद्याधर का विमान मानुषोत्तर पर्वत से आगे नहीं गया।और विमान मानुषोत्तर पर्वत से टकराकर टूट गया।
मानुषोत्र की भेंटतै,परो धरनि खिर भार।
विद्यापति-भव चुरियो,देव भयो सुरसार।।11।।
भावार्थ-: मानुषोत्तर पर्वत टकराकर विमान चकनाचूर होकर धरती पर बिखर गया।विद्याधर मरण को प्राप्त हुआ और नन्दीश्वर द्वीप जाने की शुभ भावना के साथ मरण करके स्वर्ग में देव हुआ।
द्वीप-नन्दीश्वर छिनक में, पूजा वसु-विध ठान।
करी सु मन-वच-काय से,माल लई कर मान।।12।।
भावार्थ-: देव पर्याय को प्राप्त करके पूर्व पर्याय का स्मरण हो गया।विद्याधर का जीव जो देव बन गया था वो नन्दीश्वर द्वीप जाकर अष्ट द्रव्य से मन वचन काय सहित अकृत्रिम चैत्यालयों की पूजन की।और वहाँ से एक दिव्य माला लेकर चल दिया।
आनंद सो घर आइयो,नन्दीश्वर कर जात।
विद्यापति को रूप धर,राणी सों कहै बात।।13।।
भावार्थ-: नन्दीश्वर द्वीप से चलकर आनन्द के घर आया।विद्याधर का रूप बनाकर रानी से बोला-कि मैं नन्दीश्वर द्वीप पूजन कर आया हूँ।
राणी बोली सुन राजा,यह तो कबहुँ न होय।
जिनवाणी मिथ्या नहीं, निश्चय मन में सोय।।14।।
भावार्थ-: रानी बोली-राजन!सुनिए।ऐसा कभी नहीं हो सकता हैं, जिनेन्द्रदेव के वचन झूठे नहीं हो सकते हैं,ये मेरे मन का दृढ़ निश्चय हैं।
नन्दीश्वर की माल ले,राय दिखाई आय।
अब तू साँचो जान मोहि,पूजन कर बहु भाय।।15।।
भावार्थ-: विद्याधर बने देव ने रानी को विश्वास दिलाने के लिए दिव्य माला दिखाई।और कहा-अब तू मेरी बात को सच जान कि मैं नन्दीश्वर द्वीप पूजन करके आया हूँ।
रानी फिर तासों कहै,नर-भव परसे नाहिं।
पश्चिम सूरज-उदय हुए,जिनवाणी शुचि ताहि।।16।।
भावार्थ-: रानी ने फिर से कहा-कि मनुष्य पर्याय से नहीं जा सकते हो।सूर्य पश्चिम से उदय हो सकता हैं लेकिन जिनवाणी मिथ्या (झूठी) नहीं हो सकती हैं।
रानिसों नृप फिर कही,बावन-भवन जिनाल।
तेरह-तेरह मैं वंदे, पूजन करि तत्काल।।17।।
भावार्थ-: विद्याधर रूपी देव ने रानी से कहा-नन्दीश्वर द्वीप में 52 जिनालय है।ऐसे 13 पर्वतों के चारों दिशाओं के 52 जिनालयों की वंदना की।मैंने उन सभी की पूजन की हैं।
जयमाला तहँ मो मिली,आयो हूँ तुझ पास।
अब तू मिथ्या मान मत,कर मेरो विश्वास।।18।।
भावार्थ-: विद्याधर रूपी देव ने कहा-ये दिव्य माला मुझे नन्दीश्वर द्वीप से मिली हैं।वहाँ से मैं तेरे पास आया हूँ।अब तू मुझे झूठा मत समझ और मेरा विश्वास कर।
पूरब-दक्षिण में वंदे, पश्चिम-उत्तर जान।
मैं मिथ्या नहिं भाषहूँ,श्रीजिनवर की आन।।19।।
भावार्थ-: पूर्व और दक्षिण जिनालयों की वंदना की,फिर पश्चिम और उत्तर के जिनालयों की वंदना की।मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ,मैं जिनेन्द्रदेव की सौगन्ध खाता हूँ।
हे रानी तें सच कही,जिनवानी शुभ-सार।
ढाई द्वीप न लंघई,मानुष-भव विस्तार।।20।।
भावार्थ-: विद्याधर रूपी देव ने जब ये बात निश्चय कर जान लिया कि रानी जिनवाणी की बात पर अडिग है, तब देव बोला-रानी तू सच कहती है,जिनवाणी ही शुभ हैं और मनुष्य ढाई द्वीप को नहीं लांघ सकता हैं।मनुष्य भव में ऐसा सम्भव नहीं है।
विद्यापति-तैं सुर भयो,रूप धरो शुभ सोय।
रानी की स्तुति करी, निश्चय समकित तोय।।21।।
भावार्थ-: मैं विद्याधर से देव हुआ हूँ, और तुम्हारे पास रूप बदलकर आया हूँ।रानी को सम्यग्दृष्टि जानकर,देव ने रानी का सम्मान किया।।
देव कहयो अब रानि सुन,मानुषोत्र मिलो जाय।
तहँतै चय मैं सुर भयो,पूजे नन्दीश्वर पाय।।22।।
भावार्थ-: देव ने कहा-हे रानी सुनो!मैं मानुषोत्तर पर्वत से टकराकर मरण को प्राप्त हुआ और मरकर देव पर्याय को प्राप्त हुआ हूँ।और फिर नन्दीश्वर द्वीप जाकर पूजन की।
एक भवान्तर मो रहयो, जिनशासन परमान।
मिथ्याती माने नहीं,श्रावक निश्चय आन।।23।।
भावार्थ-: ऐसे पूण्य से मेरा एक भव शेष रह गया,ये जिनेन्द्रदेव की वाणी है।मिथ्यादृष्टि इस बात को नहीं मानते लेकिन सम्यग्दृष्टि जिनेन्द्रवाणी पर अटल विश्वास रखते हैं।
सुर-चय नर हथनापूरी,राज कियो भरपूर।
परिग्रह-तजि संयम लियो,कर्म-महागिर चूर।।24।।
भावार्थ-: देव पर्याय को पूर्ण कर विद्याधर के जीव,हस्तिनापुर का राजा हुआ।राज्य करने के पश्चात समस्त परिग्रह को त्याग कर संयम धारण किया और कर्मों के पर्वतों को चूर चूरकर दिया।
केवलज्ञान उपाय कर,मोक्ष गये मुनिराय।
शाश्वत-सुख विलसे जहाँ, जामन-मरन मिटाय।।25।।
भावार्थ-: केवलज्ञान को प्राप्त कर,विद्याधर के जीव ने मुनि बनकर मोक्ष को प्राप्त किया।शाश्वत सुख को प्राप्त कर-जन्म मरण को मिटा दिया।
अब रानी की सुन कथा,संयम लीनो धार।
तपकर चयकर सुर भयी, विलसे सुख विस्तार।।26।।
भावार्थ-: कवि श्री विनयकीर्ति जी कहते है-अब रानी की कथा सुनो।रानी ने संयम धारण किया और तप के प्रभाव से देव बनी,स्वर्ग में अधिक समय तक सुख को भोगा।
गजपुर नगरी अवतरो,राज करे बहु भाय।
सोलहकारण भाइयो,धर्म सुन्यो अधिकाय।।27।।
भावार्थ-: रानी के जीव से देव पर्याय को पूर्ण कर गजपुर(हस्तिनापुर)के राजा के रूप में जन्म लिया।बहुत अधिक समय तक राज्य का सुख भोगा।धर्म सुनकर-दर्शनविशुद्धि आदि सोलहकारण भावना भायी।
मुनि संघाटक आइयो,माली सार जनाय।
राजा वंदयो भावसों,पुण्य बढ़यो अधिकाय।।28।।
भावार्थ-: एक बार हस्तिनापुर के उद्यान में संघाटक नामक मुनिराज पधारे। माली ने मुनिराज के आने का शुभ संदेश राजा को सुनाया।राजा ने मुनिराज की भावों से वंदना की,और बहुत अधिक पुण्य को बढ़ाया।
राजा मन वैरागियो, संयम लीनो सार।
आठ सहस नृप साथ ले,यह संसार-असार।।29।।
भावार्थ-: राजा के मन वैराग्य समाया और जिनदीक्षा अंगीकार की।यह संसार असार है ऐसा जानकर राजा के साथ 8 हजार राजाओं ने दीक्षा ली।
केवलज्ञान उपाय के,दोय-सहस निर्वान।
दोय-सहस सुख स्वर्ग के,भोगे भोग सुथान।।30।।
भावार्थ-: 8 हजार राजा में से 2 हजार राजा ने निर्वाण प्राप्त किया। 2 हजार राजा ने स्वर्ग जाकर उत्तम भोग भोगे।।
इस पर्व के जाप्य :
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अष्टमी : ॐ ह्रीं नन्दीश्वरसंज्ञाय नम:
नवमी : ॐ ह्रीं अष्टमहविभूतिसंज्ञाय नम:
दशमी : ॐ ह्रीं त्रिलोकसारसंज्ञाय नम:
एकादशी : ॐ ह्रीं चतुर्मुखसंज्ञाय नम:
द्वादशी : ॐ ह्रीं पंचमहालक्षणसंज्ञाय नम:
त्रयोदशी : ॐ ह्रीं स्वर्गसोपानसंज्ञाय नम:
चतुर्दशी : ॐ ह्रीं सिद्धचक्राय नम:
पूर्णिमा : ॐ ह्रीं इन्द्रध्वजसंज्ञाय नमः
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