वाराणसी 22/09 /2026
दशलक्षण महापर्व उत्तम तप धर्म के सात वे दिन मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुई
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- शांतिपूर्वक कष्ट सहने के अभ्यास को तप कहते हैं
,तप से आत्मा पवित्र होती है
- तप से ही अध्यात्म की यात्रा का ओंकार होता है
समाधिस्थ परम पूज्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज
मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सान्निध्य में
2 2सितंबर 2026 को प्रातः काल की बेला में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन तीर्थ भेलूपुर वाराणसी उत्तर प्रदेश में दशलक्षण महापर्व उत्तम तप धर्म के सातवे दिन मांगलिक क्रियाए की गयी, दशलक्षण विधान किया गया, शाम को प्रतिदिन आरती चल रही है एवं मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के द्वारा ध्यान करवाया जा रहा है, 7 उपवास करने वालों के द्वारा शास्त्र अर्पण किया गया,
, धर्मसभा को संबोधित करते् हुए मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज ने कहाकि जो लोग व्रत, उपवास, साधना कर रहे हैं वह तप कर रहे हैं,
मुनि श्री भाव सागर महाराज ने कहा कि तपने के बाद आत्मा शुद्ध होती है, इच्छाओं को रोकना तप है, तपमनुष्यों के लिए चिंतामणि है, सोना तपने के बाद ही आभूषण बनता है, शांतिपूर्वक कष्ट सहने के अभ्यास को तप कहते हैं,तप से आत्मा पवित्र होती है, तप से ही अध्यात्म की यात्रा का ओंकार होता है,
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