हजारीबाग न्यूज़ 04/06/2026
दान देने से भगवान और महान बनता है व्यक्ति
दान से सम्मान मिलता है ,पूरी दुनिया में प्रसिद्धि फैलती है
घर की अनावश्यक वस्तुओं को गरीबों को दान करना चाहिए
गौशाला में जाकर गोग्रास का दान करना चाहिए
दान देने वाला करोड़ों में एक होता है
समाधिस्थ परम पूज्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज,
मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सान्निध्य में 4जून2026 को प्रातः काल की बेला में श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन बडा बाजार मंदिर हजारीबाग झारखंड में श्री
विशेष मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुई,
इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए
मुनि श्री भावसागर जी महाराज ने कहा कि , प्रभु का हो या परोपकार का कार्य उसके लिए जो भी दान दिया जाता है ,अर्पित किया जाता है फिर उस धन संपत्ति का उपयोग नहीं करना चाहिए ,दान देने से भगवान और महान बनता है व्यक्ति ,दान से शत्रुता का नाश होता है ,दान बोलकर नहीं देने से बीमारियां होती हैं, परेशानी आती है, प्रतिमा मंदिर ,शिखर के लिए दान देने वाले की महिमा का वर्णन करने के लिए सरस्वती भी समर्थ नहीं है, पूर्वजों ने जो भी मंदिर बनवाए थे हम उनकी सुरक्षा कर रहे हैं यह महत्वपूर्ण कार्य है ,दान से सम्मान मिलता है ,पूरी दुनिया में प्रसिद्धि फैलती है ,घर से जो पूजन की शुद्ध सामग्री लाता है वह विशेष पुण्य का अर्जन करता है , दान देने वाला करोड़ों में एक होता है, कंजूस धन जोड़ जोड़कर छोड़कर चला जाता है, उसका उपयोग दूसरे लोग करते हैं,दान देने से आज तक कोई गरीब नहीं हुआ,पक्षियों को भी सकोरे में जल रखना चाहिए, मंदिर में भी छत्र , चंवर ,भामंडल, घंटा, सिंहासन आदि दान करना चाहिए, मंदिर के लिए भूमि, मकान, दुकान, स्वर्ण, रजत के आभूषण के दान करने को भी पूजन माना है,लोग जोड़ जोड़कर इकट्ठा करते हैं और कोई ग्राहक,पड़ोसी ,रिश्तेदार, परिवार,मित्र उस धन को हजम कर जाते हैं,
घर की अनावश्यक वस्तुएं जो हम साल भर उपयोग नहीं करते हैं उनको दान कर देना चाहिए जो गरीब होते हैं उनको, पूरे देश में जिनके यहां विवाह, जन्मदिन,विवाह की सालगिरह , पुण्य स्मृति दिवसआदि कार्यक्रम होते हैं ,मंदिर, पाठशाला ,गौशाला के लिए, परोपकार के कार्य के लिए जरूर दान देना चाहिए,
मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज ने कहा कि ज्ञान हमें सही मार्ग दिखाता है और कर्म उस मार्ग पर चलने की शक्ति देता है। केवल ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं, उसे जीवन में उतारना भी आवश्यक है। वहीं बिना सही ज्ञान के किया गया कर्म कई बार गलत दिशा में ले जा सकता है। जैसे दीपक प्रकाश देता है, वैसे ही ज्ञान जीवन को दिशा देता है, और कर्म उस दिशा को सार्थक बनाता है। ज्ञान और कर्म का समन्वय ही सफलता, आत्मकल्याण और समाज कल्याण का आधार है। जो व्यक्ति सही ज्ञान के साथ श्रेष्ठ कर्म करता है, वही जीवन में वास्तविक प्रगति प्राप्त करता है। इसलिए जीवन में ज्ञान और कर्म दोनों का संतुलन आवश्यक है।
प्रकृति और जीवन दोनों संतुलन का संदेश देते हैं। किसी भी वस्तु, विचार, धन, भोजन, क्रोध, मोह या अहंकार की अति अंततः हानि का कारण बनती है। आवश्यकता तक का उपभोग सुख देता है, लेकिन अति दुख का कारण बनता है। संयम ही जीवन का सबसे बड़ा आभूषण है। जो व्यक्ति मर्यादा और संतुलन बनाए रखता है, वही शांति, स्वास्थ्य और सफलता प्राप्त करता है। इसलिए जीवन में मध्यम मार्ग अपनाकर विवेकपूर्ण आचरण करना चाहिए। अति से बचना और संतुलन बनाए रखना ही सुखी जीवन की कुंजी है।
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