हजारीबाग न्यूज़ 30/05/2026
धार्मिक क्रियाएं भी मॉडर्न जमाने के हिसाब से एडवांस टेक्नोलॉजी से करना चाहिए
भारत के सभी नगरों में डिजिटल पाठशाला होना चाहिए
समाधिस्थ परम पूज्य
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित एवं परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनि श्री धर्म सागर जी महाराज,मुनि श्री भाव सागर जी महाराज के सान्निध्य में 38मई2026 को प्रातः काल की बेला में श्री , पारसनाथ दिगंबर जैन बडा बाजार मंदिर हजारीबाग झारखंड में विशेष मांगलिक क्रियाएं संपन्न हुई,
इस अवसर पर धर्म सभा को संबोधित करते हुए
मुनि श्री भाव सागर जी महाराज ने कहा कि बच्चों को अच्छे संस्कार देना चाहिए, आज एआई का युग है, भारत के सभी नगरों में डिजिटल पाठशाला होना चाहिए, जिससे बच्चे अच्छी कहानी देख सकें सुन सकें और धर्म की कठिन बाते भी सीख सके, धार्मिक क्रियाएं बच्चों को सिखाना चाहिए, जिस धर्म सुरक्षित रह सके, धार्मिक क्रियाएं भी मॉडर्न जमाने के हिसाब से एडवांस टेक्नोलॉजी से करना चाहिए, क्रियाओ में शुद्धि विशुद्धि का भी ध्यान रखना चाहिए,हर क्रिया में इंटरनेशनल टाइम मैनेजमेंट होना चाहिए, लड़कों को भोजन बनाना सीखना चाहिए, सप्ताह में एक दिन यदि पुरुष वर्ग और युवा वर्ग,भोजन बनाएंगे तो महिलाओं को परेशानी भी नहीं जाएगी, और इमरजेंसी में वह भोजन बना सकेंगे,मोबाइल युग में अहिंसा, संयम और विवेक के बीज बोने की कलाहै,आज का बच्चा मोबाइल में जन्म ले रहा है। टिकटॉक की दुनिया, इंस्टा की रील , व्हाट्सएप ,फेसबुक ,यूट्यूबऔर AI के दौर में उसे ‘संस्कार’ सिखाना पहाड़ चढ़ने जैसा लगता है। लेकिन धर्म का मार्ग हमें बताता है – युग बदलता है, मूल सिद्धांत नहीं बदलते। बस उन्हें नए ढंग से समझाना होता है। बच्चों को समझाएं कि किसी को ऑनलाइन ट्रोल करना, गाली देना, अफवाह फैलाना भी ‘वचन हिंसा’ है। रात में 10 मिनट परिवार के साथ ‘ का समय रखें। दिन में किसी का दिल दुखाया हो तो माफी माँगें। बच्चा खुद सीखेगा।
आज 5 साल का बच्चा भी नया फोन मांगता है।
- बच्चे को जन्मदिन पर 5 गिफ्ट की जगह 1 गिफ्ट 1 ‘अनुभव’ दें – मंदिर ,दर्शन, गोशाला सेवा।
‘संतोष जार’ बनाएं। जब बच्चा कुछ नया माँगे, 7 दिन इंतज़ार कराएं। अगर 7 दिन बाद भी जरूरत लगे तो दिलाएं। 90% इच्छाएँ खुद खत्म हो जाती हैं,मोबाइल ने बच्चों को जिद्दी बना दिया है।
जब बच्चा कहे ‘मेरा दोस्त गलत है’, तो पूछें – “उसकी जगह तुम होते तो क्या करते?”
-डिनर टेबल पर ‘दूसरा पक्ष’ गेम खेलें। न्यूज की किसी बहस पर बच्चे से दोनों तरफ के तर्क बुलवाएं। रील नहीं, रियल नॉलेज को तप कहा गया है। बच्चे को दिन में 20 मिनट ‘स्क्रीन-फ्री स्वाध्याय’ दें। गाथा, जैन कहानी, या ‘पुण्य-बैंक’ बनाएं। 1 पेज धार्मिक पढ़ने पर 10 पुण्य पॉइंट। 100 पॉइंट माता-पिता से आउटिंग।
संयम का मतलब बोरिंग नहीं, सुपरपावर है
24 घंटे गेम, बच्चे चिड़चिड़े हो जाते है। धर्म का संयम उसे ‘फोकस’ सिखाता है, ‘मौन शुरू करें। रोज शाम 7 से 7:30 तक पूरा परिवार मौन मोबाइल साइलेंट। शुरू में मुश्किल, 21 दिन में आदत।’इंटरमिटेंट फास्टिंग’ कहकर समझाएं। विज्ञान भी मानेगा, धर्म भी निभेगा।
बच्चों को डाँटकर धर्म नहीं सिखाया जाता। माता-पिता खुद सुबह 5 बजे उठकर ध्यान करें। बच्चा बोलेगा नहीं, पर देखकर सीखेगा। आचरण सबसे बड़ी पाठशाला है।आज का बच्चा AI चलाएगा, अच्छी बात है। लेकिन संस्कार उसे सिखाएंगे कि तकनीक का इस्तेमाल ‘स्व’ के उत्थान के लिए करना है, ‘स्व’ के पतन के लिए नहीं।
बच्चों पर कोई भी नियम थोपने से पहले उनका मनोविज्ञान समझें।
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