- श्री दिगंबर जैन धर्म के अनुसार”नंदीश्वर द्वीप का वर्णन (अष्टाह्निका पर्व पर विशेष
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संकलन :-
महासमाधिधारक परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित- परम पूज्य आचार्य श्री 108 समय सागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती शिष्य परम पूज्य मुनि श्री 108 भाव सागर जी महाराज
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मध्यलोक के असंख्यात द्वीप-समुद्रों में आठवाँ नंदीश्वर द्वीप है जिसका विस्तार एक सौ त्रेसठ करोड़ चौरासी लाख योजन है। इस नंदीश्वर द्वीप में बावन अकृत्रिम जिनालय हैं, जो ढोल के समान गोल आकार वाले व ऊपर से समतल पर्वतों के शिखरों पर बने हैं। ये पर्वत मणि मुक्ताओं से जड़े हुए स्वर्ण व चाँदीमय हैं। पूर्वादि चारों दिशाओं के बहुमध्य भाग में उत्तम इन्द्रनील मणि के नीले रंग के श्रेष्ठ चौरासी हजार योजन विस्तृत एवं इतने ही ऊँचे एक-एक अंजनगिरि पर्वत हैं। इन पर एक-एक वज्रमय जिनमंदिर है। इन पर्वतों की चारों दिशाओं में एक-एक लाख योजन विस्तार वाली चौकोन एक-एक बावड़ियाँ हैं। इन बावड़ियों के मध्यभाग में दस हजार विस्तृत एवं इतने ही ऊँचे दही के समान सफेद रंग के एक-एक दधिमुख पर्वत हैं। इन चारों दिशा के सोलह दधिमुख पर्वतों पर एक-एक जिनमंदिर हैं। पुनः इन प्रत्येक बावड़ियों के दोनों अभ्यंतर कोनों पर एक हजार योजन विस्तृत और इतने ही ऊँचे सुवर्णमय लाल रंग के एक-एक रतिकर पर्वत हैं। इन बत्तीस रतिकर पर्वतों पर एक-एक वज्रमय जिनमंदिर हैं। इस प्रकार एक अंजनगिरि, चार दधिमुख, आठ रतिकर ये प्रत्येक दिशा में 13-13 जिनमंदिर हैं। एक-एक जिनमंदिर में 108-108 जिन प्रतिमाएँ पाँच सौ धनुष ऊँची स्वर्ण व रत्नमयी पद्मासन से विराजमान हैं। इस प्रकार इस द्वीप की महिमा अवर्णनीय है। इसके आह्लाद पूर्वक दर्शन मात्र से मिथ्यात्व का नाश होकर सम्यक्त्व की प्राप्ति हो जाती है। ऐसे जिन बिम्ब दर्शन के परिणाम मोक्षमार्ग में प्रधान कारण हैं।
यह अनादिनिधन अष्टाह्निक पर्व कार्तिक, फाल्गुन व आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की अष्टमी से पूर्णिमा तक वर्ष में तीन बार मनाया जाता है। यह पर्व इसलिये कहलाता है; क्योंकि इन आठ दिनों में
मनुष्य अपनी शक्ति की को ध्यान में रखकर यही मंदिर इत्यादि में नदीश्वर द्वीप तथा उसमें स्थित जिन मंदिर एवं जिन बिंब इत्यादि की कल्पना कर श्रद्धा भक्ति पूर्वक भगवान की पूजन करते हैं, इस पर्व पर विशेष रूप से व्रत,नियम एवं संयम पूर्वक एकासन,उपवास करते हैं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हैं, यह पर्व पूरे विश्व में मनाया जाता है, तीन लोक में यह सबसे बड़ा पर्व होता है, यह पर्व ऋतुओ का संधिकाल है, मन वचन काय की शुद्धिपूर्वक की गई व्रत की आराधना तीन भवो में संसार से पार लगा देती है,
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मध्यलोक का 8वां द्वीप है। इसमें 52 अकृत्रिम जिनालय है
।🍀🌹🌿🏵️🍁🌱 रचना: 4 अंजनगिरि, 16 दधिमुख, 32 रतिकर पर्वत = प्रत्येक दिशा में 13 मंदिर = कुल 52 मंदिर
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प्रतिमा: प्रत्येक मंदिर में 108-108 जिन प्रतिमाएँ, 500 धनुष ऊँची
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. अष्टाह्निका पर्व: कार्तिक, फाल्गुन, आषाढ़ शुक्ल पक्ष कीअष्टमी से पूर्णिमा तक 8-8 दिन मनाया जाता है।
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पद्मपुराण में वर्णन आता है कि मदिरों को
ध्वजाओ से अलंकृत किया जाता है, जिनालय का श्रृंगार किया जाता है, उत्तम द्वार बनाए जाते हैं
मोतियों की माला लटकती हैं, अभिषेक होता है, हजारों कलश दिखाई देते हैं, उसे समय किए गए कार्यों की शोभा देखते ही बनती है, कोई मॉडल बनाने के लिए बड़े आदर से चूर्ण पीसने का कार्य करता है,कोई जिन मंदिर द्वार का श्रृंगार करता है, कोई उत्तम सामग्री को एकत्र कर अभिषेक करता है, स्वर्ण, रजत,रत्नों से पूजन होती है, विभिन्न प्रकार के वाद्य यत्रों की ध्वनि होती है, रथ निकाला जाता है, इन दिनों समस्त पृथ्वी पर राजा की ओर से जीवों के मारने का निषेध रहता था,

