सूतक समाधान विशेष बिंदु

सूतक समाधान विशेष बिंदु
संकलन :-
पपूआचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज से दीक्षित
मुनिश्री भावसागर जी महाराज

A1 (नोट :- हमारा प्रयास प्रत्येक गाँव, नगर, शहर में विवाद नहीं हो एवं विवाद सुलझाने का छोटा सा प्रयास है हमारी जिम्मेदारी किसी विवाद की नहीं है।)

सूतक में क्या करें क्या नहीं

A2. सूतक – पातक संबंधी मान्यताएँ प्रत्येक गाँव या नगर मेंभिन्न-भिन्न प्रकार देखी जाती है, अतः विभिन्न शास्त्रों तथा आचार्यों, मुनिराजों एवं विद्वानों से चर्चा करके निम्न विवरण दिया जा रहा है। ताकि पूर्व से चली आ रही जो परंपराएं हमको मर्म से दूर करती हैं, उनको शास्त्रानुसार बदला जा सके। (इसमें वैज्ञानिक कारण, लोक रीति, वर्तमान के प्रचलन का ध्यान रखा गया है।)

A3. सूतक – पातक में देव, शास्त्र, गुरू का स्पर्श वर्जित है एवंअभिषेक, द्रव्यपूजा, आरती, गंधोदक का पात्र छूना, पूजन के बर्तन, माला एवं साधुओं की वैया वृत्ति एवं आहार दान वर्जित है एवं सिर्फ गर्भ गृह में प्रवेश वर्जित है, दर्शन करने में कोई बाधा नहीं है, भाव पूजा करने में कोई बाधा नहीं है, साधुओं के दर्शन भी संत निवास आदि में एवं कमरे में दर्शन करने में कोई बाधा नहीं है। मंदिर की चटाई, दरी पर नहीं बैठ सकते लेकिन शास्त्र सभा में बैठकर स्वाध्याय सुन सकते हैं। जिस शास्त्र में श्लोक, गाथा, भगवान एवं साधुओं के चित्र हैं, मंत्र हैं, प्रथमानुयोग संबंधी विषय है वह ग्रंथ, पुस्तक नहीं छू सकते हैं, अन्य पूजा करने वालों के साथ खड़े होकर या बैठकर पूजा का वाचन कर सकते हैं। अन्य व्यक्ति से गंधोदक लेकर लगा सकते हैं। जन्म देने के बाद माँ भी गंधोदक लगा सकती है। 3 दिन में तेरहवीं कर लेते है तो सूतक तो 12 दिन का रहेगा, शांति
विधान तो 13 वें दिन ही होता है।

A4. बाल कटिंग का सूतक लोक प्रचलन में 6 घंटे 3 घंटे 2 घंटे 30 मि. एवं दाढ़ी बनाने का 48 मिनट का मानते हैं। इसमें देव, शास्त्र, गुरू का स्पर्श, पूजन, अभिषेक, आहारदान का निषेध करते हैं। वैसे यह कहीं शास्त्रों में पढ़ने में नहीं आया है लेकिन धवला ग्रंथ में मुनियों को केश लोंच के 3 दिन तक सिद्धांत ग्रंथ छूने का निषेध किया गया है क्योंकि बालों का संबंध मांस से रहता है और जुयें आदि की हिंसा भी हो सकती है और कटिंग करने वाले की जाति का भी कारण है। इसलिये समय टालकर आगे पीछे कटिंग एवं सेविंग कर सकते हैं।

(सम्यग दृष्टि को गर्दन भी दूसरे के आगे झुकाना पड़ती है और साधुओं को तो उपवास भी करना पड़ता है।)

A5. बटवारे वैमनस्यता में सूतक सूतक पर सम्पत्ति के बटवारे, अन्य स्थान या विदेश में रहने, पारिवारिक वैमनस्यता होने का प्रभाव नहीं पड़ता अर्थात विदेश में रहने वाले अलग-अलग निवास, व्यापार होने पर भी सूतक का दोष लगेगा सूचना मिलने का काल सूतक के समय में शामिल रहेगा, सूचना मिलने पर जितने दिन सूतक शेष हों, उतने दिन सूतक मानना चाहिए।

A6. सूतक किसे नहीं लगता सूतक का प्रभाव वंश व गोत्र

के अनुसार लगता है, यही कारण है कि विवाहिता पुत्री सूतक से अशुद्ध नहीं होती। प्रतिष्ठा पाठ के अनुसार प्रतिष्ठा कार्य में सम्मिलित पात्रों का सकलीकरण एवं नान्दी विधान के बाद (जिसमें शुद्धि करके गोत्र परिवर्तन किया जाता है) सूतक का दोष नहीं लगता है।

A7. सकलीकरण के बाद सूतक नहीं इसी प्रकार धार्मिक आयोजन में संलग्न पात्र जिसका सकलीकरण हो चुका हो, उनको भी सूतक नहीं लगता परंतु ऐसे पात्रों को सूतक स्थान में जाना, उस आयोजन में सम्मिलित होना, सूतक में अशुद्ध व्यक्तियों से सम्पर्क करना वर्जित है। यदि पात्र इन कार्यों को करता है तो वह अशुद्ध ही माना जावेगा अर्थात् सूतक का अशौच उसे मानना होगा।

A8. गर्भवती महिला 5 माह तक आहारदान दे सकती है-
(भगवती आराधना गाथा 582 पृ. 409 एवं मूलाचार पिण्ड शुद्धि अधिकार गा.469 की टीका पृ. 364 भारतीय ज्ञानपीठ) भगवती आराधना गाथा 1003 के अनुसार ” पाँचवे मास में उस मांस पिण्ड में दो हाथ, दो पैर और सिर के रूप में पाँच अंकुर उगते हैं। छठे मास में उस बालक के अंग और उपांग बनते हैं” इसलिये आहारदान 5 माह के बाद मना है क्योंकि उठने-बैठने में भी परेशानी होती है। बड़े अनुष्ठानों, विधानों आदि में भी मना किया गया है। प्रत्येक महिला अनुभूत है। स्वाध्याय कर सकती है। गर्भवती महिलायें द्रव्य पूजा तो 9 महीने तक भी कर सकती हैं। दर्शन करते समय द्रव्य भी चढ़ा सकती हैं ऐसा आचार्यों एवं विद्वानों का मत है। (कल्याण कारकम ग्रंथ में भी शरीर बनने का वर्णन है) देखें धृति क्रिया: गर्भाधान के 7 वें महीने में गर्भ की वृद्धि के लिए पूर्वोत्त विधान करना चाहिये,
मोद क्रिया :- गर्भाधान के नवमें महीने में गर्भ की पुष्टि के लिए पुनः पूर्वोत्त विधान करके, स्त्री को गात्रिका बन्ध मंत्र पूर्वक बीजाक्षर लेखन आदि कार्य करना चाहिये। (महापुराण/38-70-310/73 से 84 तक) जब “महापुराण” में विधान करने का लिखा है 7 वें, 9वें महीने में तो पूजन करने में कहाँ बाधा है। सीता, अंजना ने भी गर्भवती अवस्था में भगवान की पूजा की (पद्मपुराण) । (S.P.S.V.-4 MD)

A9. पति का मरण होने पर (विधवा महिलायें) 12 दिन का ही सूतक मानें 13 वें दिन से द्रव्य पूजन, स्वाध्याय, आहारदान आदि करें। कई महिलायें 30-40 दिन तक धार्मिक कार्य नहीं करती हैं इस संबंध में आचार्यों मुनिराजों, विद्वानों से चर्चा हुई हैं।

A10. रविवार, बुधवार को किसी के भी यहाँ मृत्यु के बाद बैठने नहीं जाते हैं यह मान्यता शास्त्रों के अनुसार ठीक नहीं है। इससे कोई फर्क भी नहीं पड़ता है। ऐसे ही पंचक का खारी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मंगल, शुक्र, शनि, रविवार को मरण के बाद हड्डियों का संचय मना किया गया है। (ग्रंथों में)

A11. जन्म या मृत्यु के दिन से तीसरे दिन तक मंदिर के बाहर जहाँ से प्रतिमा के दर्शन होते हों या मानस्तंभ के दर्शन होते हों तो अवश्य करें क्योंकि भगवान के दर्शन करने का किसी भी शास्त्रों में निषेध नहीं है, मंदिर में प्रवेश मना है। (प्रवेश द्वार से करें दर्शन) (प्रत्येक जगह जैसी स्थिति /परिस्थिति हो वैसा निर्णय लें)

(A12. ) 24 घंटे का सूतक नहीं लगता है अन्य के मरण पर -किसी के यहाँ मरण के बाद बैठने जाते हैं अथवा अंतिम संस्कार में शामिल होते हैं तो दूसरे दिन प्रातः काल पूजन एवं आहार दान कर सकते हैं। आचार्यों, मुनिराजों, विद्वानों से चर्चा हुई है जब 7वीं पीढ़ी के बाद सूतक नहीं लगता है (जैन दर्शन पुस्तक के अनुसार) और 9वीं पीढ़ी में 6 घंटे लगता है जो गोत्र के हैं तब यहाँ रिश्तेदार, पड़ोसी, संबंधी को क्यों लगेगा विशेष देखें (जैन व्रत विधान संग्रह) का प्वाइंट।यदि कोई डॉ. है और प्रसूति करवाता है अथवा आपरेशन करता है और प्रतिदिन पोस्टमार्टम करता है या अन्य डॉ. इसी प्रकार के कार्य करते हैं तो उनको तो फिर 365 दिन सूतकरहेगा इसलिये 24 घंटे का मानना ठीक नहीं बैठता है। और कहीं शास्त्रों में अभी तक देखने में भी नहीं आया। जीवों के जल जाने का पातक मात्र अग्नि लगाने वाले पुरुषों को ही होता है अन्य को नहीं (जैन व्रत विधान संग्रह पृष्ठ 132)। शव वाहक की यथा काल शुद्धि होती है। (अन्य ग्रंथ में)

अशौच आने पर धार्मिक कार्यों में तत्काल शुद्धि हो जाती है (अन्य ग्रंथ में)

(III) सूर्यास्त के पहले तक सूतक पातक होता है तो वह गणना में प्रथम दिन माना जायेगा क्योंकि जैन दर्शन में प्रत्येक कार्य सूर्योदय से सूर्यास्त तक ही किये जाते हैं। जैसे-पूजन आहारदान, आदि और हम अष्टमी, चतुदर्शी आदि पर्व में भी तिथि से मनाते हैं और तिथि परिवर्तन सूर्योदय से ही प्रारंभ होता है अधिकांश। (इसलिए 24 घंटे का कोई औचित्य नहीं लगता)

A13. सूतक पातक में मुख्य रूप से भोजन और व्यापार यदि इकट्ठा है तो सूतक-पातक समान लगेगा, अलग-अलग है तो पीढ़ी के अनुसार या उपर्युक्त नियमानुसार लगेगा सिर्फ भोजन भी होता है तो भी यही लागू होगा।

A14. व्रती की समाधि होती है और घर का त्याग कर देता है। और किसी साधु के पास संलेंखना लेता है तो 1 दिन का ही सूतक लगेगा परिवार जनों को।A15. गोद जाने वाले को वह जहाँ है वहीं का सूतक लगेगा।
A16. सूतक-पातक वाले के यहाँ की पूजन, आहारदान आदि की द्रव्य रिश्तेदार इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। वह द्रव्य सूतक समाप्त होने पर काल शुद्धि से शुद्ध हो जाती है।

A17. ब्रह्मचारिणी, ब्रह्मचारी, व्रती सूतक-पातक वाले के यहाँ भोजन नहीं करें।

A18. (1) सूतक पातक वालों का दान भी ग्रहण नहीं होता है।

(A18.) (II) पिच्छीधारी साधु की अंतिम यात्रा में शामिल होने वाले को 1 दिन का सूतक मानना चाहिए एवं यात्रा से लौटकर सवस्त्र स्नान करना चाहिये।

(A19. ) सूतक-पातक शास्त्रों के अनुसार

    • सूतक की अवस्था में श्रावक को अहारदानादि कार्य करने का निषेध किया गया है अर्थात अशुद्ध माना है। (भगवती आराधना अ.6, पृष्ठ 107)
  • श्री मन् नेमिचन्द्र सिद्धांत चक्रवर्ती त्रिलोकसार ग्रंथ में (924) में कहते हैं कि दुर्भावना, अपवित्रता, सूतक आदि में एवं पुष्पवती स्त्री के स्पर्श युक्त अवस्था में आहार दान नहीं देना चाहिए।
  • श्री राजमल्ल-लाटी संहिता ग्रंथ (5/251) में भोजन शुद्धि बनाये रखने के लिए यथासंभव सूतक पातक में त्याग जिनशासन में किया गया है अर्थात सूतक-पातक वाले गृहस्थ के घर में भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिए।
  • अष्टपाहुड, बोध प्राभृतम गाथा 48 की संस्कृत टीका का क्षेपक श्लोक-2 में कहते हैं कि-श्रावक होकर भी दीन भाषण करता है, सूतिका जो बालकों को जन्म कराती है, मद्य बेचता है, पान करता है तथा उनके संसर्ग में रहता है उसे सूतक युक्त अशुद्ध कहा जाता है।
  • पं. आशा धर जी अनगार धर्मामृत में (5/34) में कहते हैं कि- शव को श्मशान में छोड़कर आये हुये, मृतक, सूतक से युक्त, व्याधियुक्त तथा क्लीब आदि के दोष से युक्त समझना चाहिए।
  • सूतक के दिनों में दान, अध्ययन, पूजन आदि करने से नीच गोत्र का बंध होता है। (धर्म संग्रह श्रावकाचार पं. मेधावी अधिकार 6 श्लोक 257 से 261 तक)

A20. सूतक बिन्दु (नोट यदि पीहर में है विवाहित
लड़की तो) विवाहित लड़की यदि पिता के घर में न रहे, वस्त्र किसी के घर में शुद्धि संबंधी डाल देवे तो उसे पातक नहीं लगेगा, वह आहार आदि दे सकती है।

  1. दस वर्ष से ऊपर वाले बच्चे को जलाना चाहिए।
  2. आठ वर्ष तक के बच्चे का मरण होने पर परम्परानुसार दफनाना चाहिए।
  3. व्रती-ब्रह्मचारी-ब्रह्मचारिणी के माता-पिता के मरण होने पर पातक लगता है। दशमी प्रतिमाधारी यदि घर में रहता है तो उसको सूतक-पातक मानना चाहिए।
  4. ऑपरेशन के द्वारा बालक हुआ तो 45 दिन का सूतक लगेगा। पीढ़ी के अनुसार कुटुंबी जन को लगेगा।
  5. तलाकशुदा स्त्री यदि पिता के घर रहे तो उसे सूतक पातक पूरा लगेगा।
  6. खारी तीन दिन में ही उठानी चाहिए परम्परानुसार पंचक आदि में नहीं उठाते। अगर ऐसी मान्यता है तो भले देर हो

लेकिन जल्दी नहीं करनी चाहिए। उसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। तीन दिन अग्नि की आयु है, इसलिए उससे पहले नहीं उठाना चाहिये।

  1. खून में जो जम्स पाये जाते हैं। वह 9 पीढ़ी तक कुटुम्बियों में

पाये जाते हैं। इसलिये सूतक 9 पीढ़ी तक लगता है (स्व. वयो वृद्ध प्रतिष्ठाचार्य के अनुसार)

A21. आत्महत्या से सम्बन्धित 6 माह का सूतक किसको और कब लगता है देखे भाग-7मे
A22. मासिक धर्म विदेशों में अन्य धर्मों में, वैज्ञानिक आधार – क्यों?, कैसे? (देखें S.P.S.V/MDI,II,III)

1) मासिक धर्म हिन्दू धर्म, मुस्लिम, क्रिश्श्चयन, यहूदी, पारसी भी मानते हैं।

2) अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, आयरलैण्ड, न्यूजीलैंड, लेबनान, जर्मनी, फ्रांस, सीरिया, इटली, नायका, साय गोन, इंग्लैंड, अमेरिका, जापान, नाइजीरिया, चाईना, नेपाल, भूटान, सिक्किम, तिब्बत कोचीन आदि देशों में भी मानते हैं।

एम.सी. एक वैज्ञानिक विश्लेषण 3)

वैज्ञानिक एस. आई. यीसीफ (ई.स.1820) के प्रयोग का 4) परीक्षण।

A23. सूतक पातक शुद्धि का सार

  • रजस्वला स्त्री की उम्र के अनुसार शुद्धि मानी गई है। पूर्णतः शुद्धि होने के उपरांत ही देवदर्शन, पूजा, आहार, दानादि के कार्य हेतु ही शुद्ध होती है। उम्र के अनुसार शुद्धि होने के बावजूद भी चौथे दिन ही स्नान के योग्य होती है, दो या तीन दिन में नहीं। जरा भी अशुद्धि हो तो पृथक खड़े होकर मुनि
  • (अपने नियम सूतक मैटर भाग 3)
    प्रगट रहे कि कहीं-कहीं देश भेद से सूतक विधान में भी भेद 8 होता है इसलिये देश पद्धति तथा शास्त्र पद्धति का मिलान कर पालन करना चाहिये (श्रावक धर्म सं. पृ. 307)

A27. सूतक – पातक नहीं मानना भी मिथ्यात्व है और ज्यादा मानना भी दोष है। सूतक पातक में जो अशुद्धि होती है उसके कारण से पूजा, आहारदान, देव शास्त्र गुरू को स्पर्श के लिए मना किया गया है। इसलिये जन्म होता है तो राग के कारण पूजन आदि में मन भी नहीं लगता है और यदि मरण हो जाता है तो भी विषाद हो जाता है जिसके कारण भी मन नहीं लगता है। ऐसा आचार्यों, विद्वानों आदि का मत है इस प्रकार इस लेख को पढ़कर खुद सूतक पातक पालन करें और करवायें तथा ज्यादा से ज्यादा प्रचार करें एवं सामाजिक विवादों से बचकर धर्म ध्यान में लगें और श्रावक मार्ग से क्रमशः मोक्षमार्ग को प्राप्त करें यही भावना है। इसमें कोई त्रुटि रह गयी हो तो आचार्य/मुनिराज/विद्वत जन अवगत करायें जिससे सुधार किया जा सके। इस संबंधी विवाद की जिम्मेदारी हमारी नहीं है हमारी कोशिश विवाद सुलझाने की है इसलिये यह प्रयास किया है।

A28. जो कहने योग्य था वह सम्पूर्णतया कह दिया गया है इतने मात्र से ही यदि यहाँ कोई चेत जाये तो समझ ले अन्यथा ना वाणी का अतिविस्तार किया जायें तो भी निश्चेतन अर्थात् समझ को व्यामोह का जाल वास्तव में अति दुस्तर है। (प्रवचनसार चरित्र चूलिका गा.219 पृष्ठ 513 टीका का श्लोक नं. 14)

  1. सूतक संबंधी सम्पूर्ण विषय देखें संदर्भ ग्रंथ में
    सम्पूर्ण जानकारी हेतु देखें)- (सूतक पातक समाधान ‘विस्तार’ भाग – 1,2,3,4,5)
    संपूर्ण जानकारी हेतु देखे
    https://linktr.ee/Jindharmmatter
    वेबसाईट:- www.jindharma.com
    यू ट्यूब :- jaindharmvani
    संपर्क सूत्र:- 9301301540,
    8120226691

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